21वीं सदी का सबसे लंबा पूर्ण चंद्रग्रहण आज, जानिए चांद से जुड़ी कई वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण जानकारी

राष्ट्रीय खबर
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आज की रात होने वाला चंद्रगहण 21वीं सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण माना जा रहा है। इसकी कुल अवधि 6 घंटा 14 मिनट रहेगी। इसमें पूर्णचंद्र ग्रहण की स्थिति 103 मिनट तक रहेगी। भारत में यह लगभग शुक्रवार (आज) रात्रि 11 बजकर 55 मिनट से शुरू हो कर लगभग शनिवार (सुबह) 3 बजकर 54 मिनट पर पूर्ण होगा। इस चन्द्र ग्रहण में सुपर ब्लड ब्लू मून का नजारा भी दिखेगा। चंद्र ग्रहण के समय चांद ज्यादा चमकीला और बड़ा नजर आएगा इसमें पृथ्वी के मध्यक्षेत्र की छाया चंद्रमा पर पड़ेगी। आज के चंद्रग्रहण को देश के सभी हिस्सों से देखा जा सकेगा। भारत के अलावा ये चंद्रग्रहण ऑस्ट्रेलिया,एशियाई देश और रूस में भी दिखेगा।

सूर्य और चंद्रमा के बीच जब पृथ्वी एक सीधी रेखा में आ जाती है तो यह ज्यामितीय स्थिति चन्द्रग्रहण कहलाती है। अतएव चंद्रग्रहण सिर्फ पूर्णिमा को ही घटित हो सकता है। ग्रहण का प्रकार एवं अवधि सूर्य और धरती के मध्य चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर होता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है, ग्राह्य, अंगीकार, स्वीकार, धारण या प्राप्त करना। लिहाजा आध्यात्मिक मान्यताएं ग्रहण काल में ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को अंगीकार करने के लिए जप, तप, उपासना, साधना, ध्यान और भजन का निर्देश देती हैं। आपको बता दें आज पड़ने वाले इस ग्रहण के बारे में ज्योतिषों ने बताया है कि यह चंद्रग्रहण पृथ्वी की छाया के बीच से चंद्रमा के सीधे गुजरने के कारण इसका समय इतना लंबा होगा। इस दौरान सूर्य से दूरी अधिक होने के कारण पृथ्वी की छाया का आकार बड़ा होगा।

आज समय के साथ इस तरह बदलेगा चांद का आकार

भारत में आज देर रात से चंद्रग्रहण का असर दिखना शुरू होगा। धीरे-धीरे चांद का रंग लाल होता जाएगा और एक समय ऐसा आएगा जब चांद पूरी तरह से गायब हो जाएगा।

शुक्रवार देर रात 10.53 पर चांद पर ग्रहण का असर शुरू होगा, हालांकि नंगी आंखों से कुछ नहीं दिखेगा।

शुक्रवार रात्रि 11.54 पर धीरे-धीरे ग्रहण का असर नंगी आंखों से देख पाएंगे।

देर रात 1.51 पर चंद्रग्रहण अपने सर्वोच्च स्तर पर होगा, ये ही पूर्ण चंद्रग्रहण होगा।

2.43 पर धीरे-धीरे ग्रहण का असर कम होगा।

शनिवार सुबह प्रातः 5.00 बजे चंद्रग्रहण का असर खत्म होगा।

आज दोपहर से ही बंद हो जाएंगे कई बड़े मंदिरों के पट

चंद्र ग्रहण 5 ग्रहों बुध, शुक्र, बृहस्पति, शनि और मंगल के साथ बड़ा चक्कर लगाएगा। चंद्रग्रहण के कारण ही देशभर के कई बड़े मंदिर दोपहर बाद ही बंद हो जाएंगे। हरिद्वार, वाराणसी और इलाहाबाद में हर शाम होने वाली गंगा आरती भी दोपहर को होगी। चंद्रग्रहण के कारण ही दोपहर एक बजे गंगा आरती का विशेष आयोजन किया जाएगा। देश के कई बड़े मंदिरों में दोपहर दो बजे के बाद दर्शन नहीं हो पाएंगे।

आकाश में एक रेखा में चमकीले ग्रह, शुक्र, बृहस्पति, शनि, मंगल, एक बड़े घेरे में दिखाई देंगे। सूरज ढलने के ठीक बाद बुध पश्चिम में दिखाई देगा। पश्चिम में शुक्र को देखा जा सकेगा। मध्य आकाश में शनि के बाद बृहस्पति दिखाई देगा। मंगल ग्रह लाल रंग के साथ पूर्वी आकाश में दिखाई देगा।

नासा अंतरिक्ष में भेजा गया ‘अपोलो7’ के लिए 11-22 अक्टूबर को मनाएगा गोल्डन जुबली ईयर

nasa

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खगोल विशेषज्ञों समेत ज्योतिषियों और विज्ञान में रुचि रखने वाले सभी लोगों के लिए यह काफी महत्वपूर्ण है। इससे पहले 16 जुलाई 2000 में सदी का सबसे लंबा पूर्ण चंद्रग्रहण हुआ था, जो कि आज होने वाले पूर्ण चंद्रग्रहण से चार मिनट ज्यादा लंबा था। नासा द्वारा 11-22 अक्टूबर को अंतरिक्ष में भेजा गया ‘अपोलो7’ भी इस वर्ष अपना गोल्डन जुबली ईयर मना रहा है। ऐसे में जानते हैं चांद से जुड़ी कई वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण जानकारी जो कि 18 जून 2009 को चंद्रमा पर भेजे गए अमेरिकी सैटेलाइट ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ ने नासा के जरिए साझा की हैं।

पानी की खोज
वैज्ञानिकों का मानना है यदि चांद नहीं होता, तो शायद पृथ्वी पर मानव जाति का उदय भी नहीं हुआ होता क्योंकि समुद्रों में ज्वारभाटा ही नहीं आता। इससे जमीन और समुद्री जल के बीच पोषक तत्वों के आदान-प्रदान की प्रोसेस स्लो हो जाती और मानव जाती होती भी या नहीं ये कहना भी मुश्किल है। ऐसे में चांद पर पानी का मिलना एक बड़ी वैज्ञानिक खोज मानी जाती है। बर्फ के रूप में चट्टानों के बीच चंद्रमा पर ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ ने अक्टूबर साल 2009 में पानी खोजा। यह पानी चंद्रमा के उत्तर पोल पर खोज निकाला गया था। हालांकि यहां पर पानी तरल नहीं बल्कि सॉलिड फॉर्म में मौजूद है। नासा के एलएडीईई प्रोजेक्ट के मुताबिक यह हीलियम, नीयोन और ऑर्गन गैसों से बना हुआ है।

चंद्रमा पर गहरा गड्ढा
चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा 4.5 अरब साल पहले पृथ्वी और थीया (मार्स के आकार का तत्व) के बीच हुए भीषण टकराव के बाद बचे हुए अवशेषों के मलबे से बना था। ऐसे में ‘द ल्यूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर’ के द्वारा भेजी गई तमाम जानकारियों के बीच 2 बड़े गड्ढों की डिटेल्स बेहद महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये गड्ढे उस वक्त बने जब भूमिगत लावा ट्यूब फटी होगी। ये घटना किसी उल्का पिंड के गिरने से भी संभव है। ये गड्ढे ज्वालामुखी के नजदीक मौजूद क्षेत्र में है।

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